मैं केवल गेरू और मिट्टी की बनी एक ईमारत नहीं हूँ। मेरे में भी एहसास है, धड़कन है और कुछ दर्द भी। पर मैं मजबूती से उन सभी भावनाओ को समा ाकता हूँ और व्यक्त भी कर सकता हूँ। जब भी कोई वीर नारीं मंरी सीड़िया चढती है, उसकी उम्मीद से मेरी धड़कन बढ़ती है क्योंकि वो कुछ उम्मीद से मेरे पास आ रही है। मैं उसकी उम्मीदों पर खरा उतरना चाहता हूँ- आश्रय, आराम और आश्वासन देकर। मेरा निर्माण इसीलिय तो हुआ था आज से 50 साल पहले।
मेरी बहनों – बेटियों मुझसे निराशमत होना। जब तब चहोगी मै यीं मिलूंगा। पर सच्चाई तो यह है कि मैं नही चाहती कि आज के बाद किसी वीर नारी को मेरे सहारे की ज़रूरत पड़े। पर मुझे सम्भाल कर रखना, याद रखना कि मैं ज़रूरत पड़ने पर यहीं मिलूंगा। मोहिनी जी ने मेरा निर्माण इसीलिये तो किया था।
सादर समर्पित
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